यह सुनने में अटपटा सा लगता है परंतु यह समय की मांग है। शादी से पूर्व युवक युवती की कुंडली मिलाने से ज्यादा जोर खून की जांच पर दिया जाना चाहिए। ऐसा कर थैलेसीमिया व अन्य रक्तजनित बीमारियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। थैलेसीमिया, हीमोफीलिया व सिकलसेल रक्तजनित बीमारियां हैं। थैलेसीमिया मरीज को विरासत में उसके माता-पिता से मिलता है। जो स्वयं थैलेसीमिया से ग्रसित रहते हैं और आगामी पीढ़ी को भी बीमारी परोस देते हैं। इस रक्त विकार में शरीर की सामान्य रूप से हीमोग्लोबिन बनाने की क्षमता प्रभावित होती है।मरीज का शरीर कम हीमोग्लोबिन प्रोटीन तथा अस्थि मज्जा यानि बोन मेरा कम संख्या में स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन करती है। इस दशा में बच्चे का विकास अवरुद्ध हो जाता है। खास बात यह है कि यदि कोई शिशु आनुवांशिक रूप से यह बीमारी लेकर पैदा होता है तो जन्म के करीब चार माह बाद ही बीमारी का पता चल पाता है। थैलेसीमिया के कारण मरीज का शारीरिक विकास धीमा पड़ जाता है। मरीज को तरह तरह के शारीरिक संकट का सामना करना पड़ता है।इसी प्रकार हीमोफीलिया बीमारी के कारण शरीर में थ्रंबोप्लास्टिक नामक पदार्थ की कमी हो जाती है। अय भी आनुवांशिक रोग है। थ्रंबोप्लास्टिक की कमी के कारण खून के थक्के बनने की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाती है जिसके कारण सामान्य चोट लगने पर तमाम कोशिशों के बावजूद रक्तस्त्राव काफी समय तक होता रहता है। सिकलसेल एनीमिया के मरीज के शरीर में रक्त व हीमोग्लोबिन की कमी होने लगती है।




