कर्म हर व्यक्ति करता है, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति की प्रगति और सफलता का अनुपात अलग-अलग होता है। साधना पद्धति, मंत्र जप, गुरु का मार्गदर्शन एक जैसा होने पर भी परिणाम रूपी फल बदल जाता है। कोई तीव्र गति से जीवन में धन-लाभ, यश-कीर्ति अर्जित करता है जबकि अन्य धीमी गति से प्रगति करते हैं। सफलता-असफलता, कम या ज्यादा प्राप्त होने का प्रमुख कारण व्यक्ति के अन्तर्मन में निहित ‘‘श्रद्धा’’ ही है। इस संबंध में धर्मशास्त्रों का मत है कि व्यक्तिगत जीवन और अध्यात्म क्षेत्र में श्रद्धा की शक्ति ही सर्वोपरि है। श्रद्धाविहीन समर्पण, प्रयास एवं साधनाओं में किया गया कार्य या श्रम निरर्थक होता है। यह श्रद्धा ही है, जो निर्जीव पाषाण प्रतिमाओं में भी प्राण का संचार कर देती है।
श्रद्धा की महिमा
मनुष्य जिसके प्रति जितनी श्रद्धा रखता है, उसी अनुपात में उससे प्रभावित होता है। जिस पर अधिक श्रद्धा होगी, उसी के बात का प्रभाव पड़ेगा। मनुष्य जिस प्रकार की श्रद्धा रखता है, संसार उसी प्रकार का दिखाई देने लगता है। लोग विद्वान एवं महापुरुषों की लिखी-कही बातों को अधिक मानते हैं क्योंकि उनके प्रति मन में अपार श्रद्धा बन जाती है। श्रद्धा भी ज्ञान के मुताबिक ही बनती है। सुख और शान्ति श्रद्धावान को ही प्राप्त होती है। मीरा ने अपनी श्रद्धा शक्ति से ही कृष्ण की प्रतिमा को कृष्ण के समान सजीव बना लिया था। श्रद्धा में वह अलौकिक शक्ति है जो मनुष्य में सामर्थ्य उत्पन्न करती है, अध्यात्मिक जगत की मान्यताओं के अनुसार साधारण स्तर के व्यक्ति को भी श्रद्धा के आधार पर ही सिद्धि प्राप्त होती है। अध्यात्मिक क्षेत्र में श्रद्धा सर्वोपरि शक्ति है, श्रद्धाविहीन उपचार सर्वथा परिणाम विहीन होते हैं और उस उपचार में किया गया श्रम प्रायः निरर्थक ही हो जाता है। मनुष्य में दृढ़ता, श्रद्धा अथवा विश्वास के आधार पर ही आती है। यदि श्रद्धा की कड़ी टूट जाए तो विघटन सुनिश्चित है।
श्रद्धा का जीवन में क्या महत्व है
खण्ड-खण्ड में बंटी श्रद्धा भूमि पर जगह-जगह गड्ढे अवश्य खोद सकती है, परन्तु जल से लबालब गहरा कूंआ नहीं बना सकती है। श्रद्धा और विश्वास की अनुपस्थिति में जीवन की गतिशीलता रूक जाती है। धार्मिक मान्यताओं में श्रद्धा रखने के कारण व्यक्ति हर प्रकार का कष्ट सहन करने को खुशी-खुशी तैयार रहता है। इसलिए सच्चा अध्यात्मिक व्यक्ति न केवल स्वयं का कल्याण करता है, अपितु अपने सम्पर्क में आए असंख्य लोगों का भी मार्गदर्शन एवं कल्याण करता है। जितनी ही आपके अन्दर श्रद्धा होगी, श्रद्धा के अनुपात अनुसार उतनी ही ईश्वर की ज्योति आपके जीवन को प्रकाशित करेगी। जितना आप सामने वाले को श्रद्धापूर्वक गम्भरीता से लेंगें, मानेंगें, उसे इज्जत देंगें, उसी अनुपात में सामने वाला आपको सम्मान व इज्जत देगा।
जीवन में खुशियां लाती है श्रद्धा
ऊपर से अगर आप सामने वाले के प्रति श्रद्धा का भाव दिखाते हैं और अन्दर से पीठ-पीछे अश्रद्धालु होकर उसी व्यक्ति के प्रति मन में ईर्ष्या आदि का नकारात्मक भाव रखते हैं, तो अध्यात्म के नियम अनुसार यह आपके लिए ही आगे जाकर नुकसानदेह साबित होगा, भले ही आप सृष्टि के इस नियम से अन्जान हों। जीवन में खुशी की पहली शर्त श्रद्धा है, इसलिए देखा जाता है कि, जिस व्यक्ति विशेष की श्रद्धा की आधारशिला मजबूत होगी, वह तकलीफों एवं परेशानियों के चक्रव्यूह को जीवन संग्राम में भेदकर बाहर निकल जाता है और ग्रहदशा अनुसार सफलता के उच्चतम शिखर तक पहुंचता है। महापुरूषों के अनमोल वाक्य अनुसार, श्रद्धावान व्यक्ति को परास्त करना सहज नहीं है। श्रद्धायुक्त होकर व्यक्ति मन में जैसा संकल्प करता है, उसी के अनुरूप प्रकल्प बनने लगते हैं और भगवत् कृपा से एक क्षण ऐसा आता है कि व्यक्ति की इच्छा साकार हो जाती है।




