, भिंड। नदी के पानी को साफ बनाने में उपयोगी चंबल में पाए जाने वाले विलुप्त प्रजाति के कछुओं की मांग देशभर में है, जिसके चलते भिंड में चंबल नदी किनारे प्रदेश के पहले मांसभक्षी संरक्षण केंद्र बरही में नमामि गंगे के तहत प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। इनकी देखरेख की जिम्मेदारी राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य के साथ-साथ भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून को दी गई है।चंबल नदी में 11 विलुप्त प्रजाति के मांसभक्षी कछुए पाए जाते हैं, जिसमें से बाटागुर, बाटागुर डोंगोका इन दो प्रजाति के 145 कछुओं के बच्चों को सेंटर में तैयार कराई गई हैचरी में रखा गया है। इन कछुओं की उम्र चार माह है। जब यह दो साल के हो जाएंगे, इसके बाद इन्हें गंगा नदी की सफाई लिए भेजा जाएगा।
2019-20 में बंद हुआ था सेंटर
गंगा नदी की सफाई के लिए बढ़ी इन कछुओं की मांग के चलते वर्ष 2016-17 में वन विभाग की टीम ने बरही में कछुओं के संरक्षण को लेकर प्रोजेक्ट को शुरू किया था। इस प्रोजेक्ट के तहत हैचरी में 600 कछुओं के अंडे और बच्चों को लाया गया था, लेकिन तेजी से कछुओं की मौत और अंडे खराब होने के बाद इस सेंटर को वर्ष 2019-20 में बंद कर दिया गया। शेष बचे हुए करीब 271 कछुए और उनके अंडों को लेकर मुरैना के देवरी सेंचुरी में भेजा गया था। पहले के प्रोजेक्ट में हुई गलतियों को सुधारते हुए इस बार राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण्य और भारतीय वन्यजीव संस्थान ने एक बार फिर से इस प्रोजेक्ट को शुरू किया है।
डाक्टर की देखरेख में होती है हैचरी की निगरानी
चंबल अभयारण्य के डीएफओ स्वरूप दीक्षित ने बताया कि बरही सेंटर में पूरी प्रक्रिया डाक्टर की देखरेख में शुरू की गई है। हैचरी में रहने वाले कछुओं की चार से पांच दिन में जांच की जाती है। इस दौरान जो कछुए अस्वस्थ नजर आते हैं, उन्हें अलग हैचरी में शिफ्ट किया जाता है। पिछली बार इस प्रोजेक्ट की असफलता के चलते इस बार हर छोटी से छोटी चीज को लेकर भारतीय वन्यजीव संस्थान के द्वारा विशेष निगरानी की जा रही है।
ये प्रजातियां पाई जाती है
चंबल नदी में बटागुर, बटागुर डोंगोका, टेंटोरियम, हारडेला थुरगी, चिप्रा इंडिका, निलसोनिया, निलसोनिया ह्यूरम, लेसिमस पंटाटा, लेसिमस ऐंडरसनी कछुओं की प्रजातियां पाई जाती हैं, जिसमें से अतिविलुप्त प्रजाति के बटागुर, बटागुर डोंगोका, टेंटोरियम और निलसोनिया कछुओं का संरक्षण किया जाना है।




