Thursday, April 16, 2026
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‘मतदाताओं को गुमराह करने के लिए होता है सोशल मीडिया का इस्तेमाल’, कर्नाटक हाईकोर्ट बोला- एक दिन लोकतंत्र को…

Karanataka High Court: कर्नाटक हाईकोर्ट ने ट्विटर की एक याचिका को खारिज करते हुए कहा कि सोशल मीडिया का ज्यादातर इस्तेमाल आम जनता के राजनीतिक मत को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है. ऐसे में यह बहुत जरूरी हो जाता है कि सरकार इन पर नियंत्रण करने के लिए प्रभावी कानून बनाए. अगर जल्द ही ऐसा नहीं किया गया तो यह ये देश के लोकतांत्रिक ढ़ांचे को घातक नुकसान पहुंचा सकता है

जस्टिस कृष्णा एस दीक्षित की सिंगल बेंच ने ट्विटर की याचिका रद्द करते हुए लॉ ऑफ लैंड को सर्वोच्च बताया है. इस मामले को सुनने के दौरान जस्टिस दिक्षित ने टिप्पणी करते हुए कहा, सोशल मीडिया ने लोगों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेने के तरीके को बदल दिया है और अक्सर इसका इस्तेमाल मतदाताओं को गुमराह करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.

उन्होंने कहा, इन दिनों लोग अपने आस-पास की घटनाओं के बारे में जानने के सोशल मीडिया पर तेजी से भरोसा कर रहे हैं. जो शायद लोकतंत्र को मजबूत भी कर सकता है, तो कमजोर भी कर सकता है. इसलिए इस पर निगरानी और नियंत्रण की जरूरत है क्योंकि ऐसा नहीं होने पर यह बहुत ही घातक रूप ले सकता है.

क्या थी ट्विटर की याचिका?
केंद्र सरकार ने ट्विटर को उसके प्लेटफॉर्म पर बने कुछ अकाउंट को भारत में ब्लॉक करने का आदेश दिया था. ट्विटर इसी आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचा था, जहां पूरे मामले को सुनने के बाद कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने बयान में कहा था कि सरकार ने जिन सोशल मीडिया अकाउंट को ब्लॉक करने का आदेश दिया था दरअसल उन्होंने भारत की संप्रभुकता को नुकसान पहुंचाने वाली बातें की थी, और कुछ ने समाज में अशांति फैलानी की भी कोशिश की थी.

 

कोर्ट ने कहा, चूंकि सोशल मीडिया लोगों के एक बड़े समूह की राजनीतिक विचारधाराओं को प्रभावित करने की क्षमता रखता है लिहाजा सक्षम संस्थाओं को इसके प्रति विशेष संवेदनशील रहने की जरूरत है.

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इंडिया टुडे की रिपोर्ट में कहा गया है कि ने प्रस्तावित यूसीसी के मसौदे में एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के अधिकारों पर विचार किया है. हालांकि, इन्हें सिफारिश का हिस्सा नहीं बनाया गया है क्योंकि समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने का मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में है और इस पर फैसला आना बाकी है. ड्राफ्ट में लिव-इन, कंसेंट भी इंडिया टु़डे ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि पैनल ने शादी की एक समान उम्र, लिव-इन रिलेशनशिप और ऐसे रिश्तों से पैदा होने वाले बच्चों, विवाह के पंजीकरण, सेक्स के लिए सहमति (कंसेंट) की उम्र, कम उम्र में बच्चे के जन्म जैसे मुद्दों को ध्यान में रखा है. महिलाओं के लिए शादी की उम्र बढ़ाने को लेकर भी ड्राफ्ट में विचार किया गया है. लैंगिक समानता सुनिश्चित करना- जस्टिस रंजना देसाई जस्टिस (रिटायर्ड) रंजना देसाई ने कहा कि कमेटी की रिपोर्ट जल्द ही प्रकाशित की जाएगी और सरकार को सौंप दी जाएगी. उन्होंने बताया कि समिति ने उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित विभिन्न पारंपरिक प्रथाओं की ‘बारीकियों’ को समझने की कोशिश की है. हमारा जोर महिलाओं, बच्चों और दिव्यांग व्यक्तियों को ध्यान में रखते हुए लैंगिक समानता सुनिश्चित करना है. हमने भेदभाव को खत्म कर सभी को एक समान स्तर पर लाने का प्रयास किया है. देसाई ने कहा कि समिति ने मुस्लिम देशों सहित विभिन्न देशों में मौजूदा कानूनों का अध्ययन किया है लेकिन उनके नाम साझा करने से इनकार कर दिया. बीते साल हुआ था समिति का गठन उत्तराखंड सरकार ने पिछले साल मई में न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) देसाई की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की एक समिति का गठन किया था. इस समिति का गठन उत्तराखंड के निवासियों के व्यक्तिगत दीवानी मामलों से जुड़े विभिन्न मौजूद कानूनों पर गौर करने और विवाह, तलाक, संपत्ति के अधिकार, उत्तराधिकार, विरासत, गोद लेने और रखरखाव जैसे विषयों पर मसौदा कानून या कानून तैयार करने या मौजूदा कानूनों में बदलाव का सुझाव देने के लिए किया गया था. इस संबंध में एक अधिसूचना 27 मई 2022 को जारी की गई थी. सीएम धामी ने दी प्रतिक्रिया उत्तराखंड के सीएम धामी ने ट्वीट कर लिखा, प्रदेशवासियों से किए गए वादे के अनुरूप समान नागरिक संहिता का मसौदा तैयार करने के लिये बनाई गई समिति ने आज 30 जून को अपना कार्य पूरा कर लिया है और जल्द ही देवभूमि उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता को लागू किया जाएगा.
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