Friday, May 8, 2026
spot_img
Homeराजनीतिककेजरीवाल मुफ्त की ‘‘रेवड़ियां’’(चारित्रिक प्रमाण पत्र) देना बंद करें- राजीव खंडेलवाल

केजरीवाल मुफ्त की ‘‘रेवड़ियां’’(चारित्रिक प्रमाण पत्र) देना बंद करें- राजीव खंडेलवाल

दिल्ली प्रदेश के उपमुख्यमंत्री तथा शिक्षा और आबकारी मंत्री मनीष सिसोदिया के खिलाफ सीबीआई का छापा व ईडी की जांच पर तिलमिलाए दिल्ली के मुख्यमंत्री एवं ’आप’ के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल अपनी ‘‘अधजल गगरी से छलका’’ हुआ पानी पी पी कर, बत्तीसी दबाकर, बारम्बार, जोरदार रूप से यह कहते कहते थक नहीं रहें हैं कि मनीष सिसोदिया 24 कैरेट के 100 प्रतिशत ‘‘कट्टर ईमानदार’’ व्यक्ति है, और उन्हें जबरन फसाॅया जा रहा है। (अब ‘‘ईमानदारी‘‘ को भी कट्टर का आभूषण पहना दिया गया है।) वैसे आज की राजनीति में तो कट्टरता का बोलबाला ही है, शायद इसीलिए सामान्य रूप से इस शब्द का उपयोग हुआ हैं। विपरीत इसके शिक्षा के क्षेत्र में मनीष सिसोदिया ने जो कि अरविंद केजरीवाल की ष्अंगूठी का नगीनाष् हैं, ’’अदभुत’’ काम किया है, इसके लिए उन्हें ‘‘भारत रत्न’’ से विभूषित किया जाना चाहिये। (बजाए जेल भेजने के)
निश्चित रूप से मनीष सिसोदिया ने यदि दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन कर उसे एक श्रेष्ठ पद्धति में परिवर्तित कर दिया है, जैसा कि “अपनी खिचड़ी अलग पकाने वाले” अरविंद केजरीवाल व आप पार्टी लगातार न केवल दावा करती आ रही है, बल्कि वह अपनी सरकार की उक्त सफलता (तथाकथितं) शिक्षा नीति और मोहल्ला क्लीनिक और मुफ्त सुविधाएं के आधार पर अन्य प्रदेशों में सफलता पूर्वक वोट भी मांग रहे हैं। उनके कथनानुसार अमेरिका की प्रसिद्ध मैगजीन ’न्यूर्याक टाईम्स’ ने भी दिल्ली के शिक्षा मंत्री की इस नीति की प्रशंसा करते हुए उनकी प्रशस्ति में मुख्यपृष्ठ पर एक लेख भी छापा है। (या छपवाया गया?) ऐसी स्थिति में ’भारत रत्न’ मांगना उनका ’अधिकार’ तो है? लेकिन यदि इस तरह से ’भारत रत्न’ की ‘‘माॅग व आपूर्ति’’ होने लग जाए तो ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसे व्यक्ति यदि वे जीवित होते तो निश्चित रूप से इन परिस्थितियों में ‘‘भारत रत्न‘‘ वापस कर देते।
निश्चित रूप से सही और सफल शिक्षा नीति लागू किये जाने के कारण मनीष सिसोदिया को भारत रत्न तो  नहीं परन्तु पद्म विभूषण पाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया में भाग लेते हुए उन्हें आवेदन जरूर देना चाहिए। क्योंकि भारत रत्न तो प्रधान मंत्री की सिफारिश पर ही राष्ट्रपति देते है। (आवेदन देने की कोई प्रक्रिया अन्य सम्मानो के समान नहीं है) वर्तमान स्थिति में यह तो संभव नहीं है। परंतु बड़ा प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि एक नई अच्छी व सफल शिक्षा नीति होने का दावा किया जा रहा है, को क्या देश के अन्य राज्य लागू करने के लिए उतने ही लालायित है? हो सकता है, तुच्छ राजनीति के चलते अच्छी नीति होने के बावजूद भी दूसरे राज्य या केंद्र इसको अपनाने में हिचक रहे हों। अरविंद केजरीवाल के इस कथन से एक बड़ा प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि देश के सेलिब्रिटीज् जिन्हें समय-समय पर विभिन्न क्षेत्रों में सर्वोच्च, उच्च ईनाम, पदक व सम्मान मिले है, क्या उन्हे आईपीसी,दंड प्रक्रिया संहिता या आपराधिक कानून से उन्मुक्त कर दिया है?
               देश के इतिहास में ऐसे कई लोग हैं जिन्हे विभिन्न क्षेत्रों में सर्वोच्च अवार्ड सम्मान पाने के बावजूद अपराधों में लिप्त होने के कारण उन्हें न्यायालीन प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ा व कई मामलों में उन्हें सजा भी हुई है। ऐसे सब गणमान्य व्यक्ति राष्ट्रीय सम्मानो से पुरस्कृत होने के कारण क्या उन्हें सीबीआई/ ईडीके क्षेत्राधिकार से मुक्त होने का पुरस्कार भी मिल जाता है? इसलिए यह कहना की सिसोदिया की भारत रत्न की पात्रता होने के कारण उनकी अपराध में संलग्नता न होना मानना बहुत ही बचकाना व बच्चों वाला तर्क एक बड़े पढ़े लिखे व्यक्ति का है। इसी कारण ‘‘अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते बनते’’ कभी कभी वे हंसी का पात्र भी बन जाते है। भाजपा का इस संबंध में किया गया तंज सटीक हैं। ‘‘सत्येन्द्र जैन के लिए पद्म विभूषण, मनीष सिसोदिया को भारत रत्न व अरविंद केजरीवाल को अगला नोबेल पुरस्कार‘‘! यानी सब ‘‘छछूंदरों के सर पर चमेली का तेल’’।
दूसरा उनका कहना कि मैं जानता हूं, मनीष सिसोदिया कट्टर ईमानदार हैं। इस देश में ईमानदारी का प्रमाण पत्र देने का अधिकार कब व कैसे मुख्यमंत्री को या आरोपी के शुभचिंतकों को दे दिया गया है, यह बात समझ, ज्ञान व जानकारी से परे है। आखिर केजरीवाल और उनकी पार्टी को चरित्र का प्रमाण पत्र देने की लत क्यों लग गई है। जब उनके पार्टी के प्रवक्ता यह कहते है कि हमारे जितने भी मंत्रियों के खिलाफ केस चलाया गया है चाहे सत्येन्द्र जैन, मनीष सिसोदिया या पूर्व में अन्य कोई, वे सब कट्टर ईमानदार बिल्कुल निर्दोष है।
आप पार्टी के संयोजक केजरीवाल को क्या यह याद दिलाना होगा कि अन्ना आंदोलन जिनकी वे अवैध उत्पत्ति हैं, इसलिये की माइक पर गले फाड़कर चिल्ला-चिल्ला कर अन्ना के सामने यह कहते थकते नहीं थे,  वर्तमान संसद में लगभग 150 से अधिक सांसद दागी है। असली ’’संसद तो सामने खड़े हुए लोग’’ है। इसलिए सही लोकतंत्र वही होगा, जब ये समस्त दागी (आरोपी) सांसद जिन पर विभिन्न गंभीर अपराधों सहित कई प्रकरण चल रहे है, संसद से इस्तीफा देकर चल रहे मुकदमें को लड़े और निर्दोष सिद्ध होकर फिर चुनाव लड़कर संसद में आये। संदर्भित उल्लेखनीय बात यह है कि महीनों से जेल में बंद मंत्री सत्येंद्र जैन से अभी तक न तो इस्तीफा लिया गया है और न ही उन्हें मंत्रिमंडल से बर्खास्त किया गया है। अब केजरीवाल इस सिद्धांत को ‘‘अंगद के पांव की तरह’’ जमे अपने ही विधायकों पर क्यों नहीं लागू कर पा रहे है? या लागू करना नहीं चाहते हैं? क्या उनका विधान/संविधान व लोकतंत्र अलग है? क्या वे पुराने जमाने के राजा समान है, जहां यह कहा जाता था कि ‘‘राजा कभी कोई गलती नहीं करता है’’? लोकपाल जो अन्ना आंन्दोलन की ‘‘रीढ़ की हड्डी’’ थी, अब राजनीतिक पटल से पारदर्शी तरीके से अदृश्य हो गई है? अपराधिक छवि लिए या अपराधिक मामले चलने वाले अपनी ही ‘‘नाक के बाल’’ नेताओं पर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध की वकालत केजरीवाल अब क्यों नहीं कर रहे है ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आगे होने के इसी क्रम में अब आप ने भाजपा पर मनीष सिसोदिया सहित अपने विधायकों की खरीद-फरोख्त व सीबीआई रेड, ईडी जांच की धमकी के आरोप जड़ दिए। आप के विधायकों का आत्मबल, मनोबल अरविंद केजरीवाल के मजबूत व चमत्कारिक नेतृत्व के बावजूद इतना कमजोर कैसे हो गया है की आप को आपके विपक्षी करोड़ों रुपए का लालच देकर खरीदने का ऑफर व धमकी देने की हिम्मत कर लेते हैं? विपरीत इसके भाजपा विधायकों की ईमानदारी और आत्मबल इतना मजबूत होता है कि कोई इस तरह की हरकत करने की सोच भी नहीं पाता है। इस प्रकार अरविंद केजरीवाल यहां भी नरेंद्र मोदी से आगे निकल गए। ऐसा लगता है भविष्य में इसी तरह से अरविंद केजरीवाल नरेंद्र मोदी से आगे होते रहेंगे?
मुफ्त की रेवड़ियां बांटने के मामले में भी अरविंद केजरीवाल उन्नीस नहीं  *बीस* सिंद्ध हो रहे है। मुफ्त शिक्षा और मुफ्त इलाज हमारी संविधानिक व्यवस्थां में दी गई है। देश में स्कूली शिक्षा और शासकीय अस्पतालों में इलाज (अन्य विशिष्ट स्वास्थ्य योजनाओं के अतिरिक्त) मुफ्त में दी जा रही है। जिसे सरकार अपना कर्तव्य मानकर व जनता सामान्य सुविधा मानकर स्वीकार करती चली आ रही है। परंतु केजरीवाल ने पहली बार इन सुविधाओं की इस तरह से ब्रांडिंग कर जनता को एहसान में डाला है कि सरकार उक्त सुविधाएं मुफ्त में रेवडियां के समान बांट कर एहसान कर ही है। इस मुफ्त की रेवडियां की अच्छी ब्रांडिग के कारण ही पंजाब मैं जीत के बाद गुजरात मैं कुछ समय बाद होने वाले चुनाव में केजरीवाल को इसका फायदा न मिले इसके जवाब में ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को मुफ्त की रेवडियां और जरूरत मंद को मुफ्त सेवा देना मैं अंतर को समझाने का प्रयास करना पड़ा।
राजीव खंडेलवाल
(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व सुधार न्यास अध्यक्ष है)
RELATED ARTICLES

ADVERTISMENT

Most Popular