Wednesday, April 22, 2026
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क्या राजस्थान में जाट-दलित समीकरण बिगाड़ सकता है बीजेपी-कांग्रेस का चुनावी खेल?

राजस्थान में आने वाले कुछ दिनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. जैसे जैसे चुनाव के दिन नजदीक आते जा रहे हैं, वैसे ही राज्य का सियासी पारा भी बढ़ता जा रहा है. सभी पार्टियां गठबंधन कर चुनाव के दंगल में जीत का गणित बैठाने में लगी हुई हैं.

इस बीच हनुमान बेनीवाल की पार्टी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) और चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी (एएसपी- कांशीराम) में पहला चुनावी गठबंधन हो गया है. इन दोनों पार्टियों ने मिलकर 200 सीटों पर प्रत्याशी खड़े करने का फैसला लिया है.

इस गठबंधन की घोषणा आरएलपी सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल और एएसपी के चंद्रशेखर ने की. यह पहला बड़ा मौका है, जब राज्य में तीसरे मोर्चे बनाने की कवायद हुई है.

ऐसे में इस रिपोर्ट में जानते हैं कि आखिर इन दोनों पार्टियों के गठबंधन का कांग्रेस या बीजेपी किसको फायदा या नुकसान होगा. इसके अलावा क्या आरएलपी- एएसपी का गठबंधन बिगाड़ सकता है कांग्रेस-बीजेपी का खेल?

 

गठबंधन के घोषणा के वक्त बेनीवाल ने क्या कहा 

इस गठबंधन की घोषणा करते हुए आरएलपी के संयोजक हनुमान बेनीवाल कांग्रेस और बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा कि राज्य के नौजवान और किसान तकलीफों से गुजर रहे है. ऐसे में प्रदेश में कांग्रेस और बीजेपी को रोकने के लिए मजबूत विकल्प की जरूरत है.

बेनीवाल ने आगे कहा कि, ‘राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी काफी लंबे वक्त से आंदोलन की राह चल रही थी और आज गठबंधन पर अंतिम मोहर लगाने के साथ ही चंद्रशेखर जी को धन्यवाद करता हूं कि उन्होंने राज्य के दलित नौजवानों की पीड़ा को समझा है.

उन्होंने आगे कहा कि इन पार्टियों का ये गठबंधन लंबे वक्त तक चलेगा. हम एक साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे और मैं जनता को विश्वास दिलाता हूं कि हमारी लड़ाई का परिणाम अलग होगा.

क्या इस गठबंधन से बदल सकता है प्रदेश का जाट-दलित समीकरण

इस बात में कोई दोराय नहीं है कि इन दोनों पार्टियों का गठबंधन प्रदेश का सियासी समीकरण बदल सकता है. अगर विधानसभा चुनाव से पहले राजस्थान में जाट और दलित मतदाता एक हो जाते हैं तो बीजेपी और कांग्रेस के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं.

कैसे बदलेगा जाट-दलित समीकरण 

दरअसल इस गठबंधन के दोनों नेता चंद्रशेखर आजाद और हनुमान बेनीवाल की कोशिश है कि वह राजस्थान जाट मतदाता और दलित मतदाताओं को एक कर सियासत में अपनी मजबूत भागीदारी बना सकें. ऐसे में अगर दोनों पार्टियों का गठबंधन सफल होता है और ये गठबंधन जाट और दलित मतदाताओं को एक मंच पर लाकर चुनाव लड़ता है तो बीजेपी और कांग्रेस का गणित बिगड़ सकता है.

राजस्थान की आबादी में किसकी कितनी संख्या 

राजस्थान की आबादी में जाटों की हिस्सेदारी लगभग 10% है, वहीं एससी 18% के करीब हैं. राजस्थान जाट महासभा के अनुसार, जाट समुदाय के लोग कम से कम 40 विधानसभा सीटों को प्रभावित करते हैं.

राजस्थान विधानसभा की 200 सीट में से 33 सीट अनुसूचित जाति और 25 सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. 142 सीट सामान्य वर्ग के लिए है. अगर दलित मतदाता और जाट मतदाता का आपस में गठबंधन हो जाता है तो यह आने वाले विधानसभा का चुनावी समीकरण बदल सकते है.

आरएलपी- एएसपी के इस समुदाय को करेंगे टारगेट 

साल 2018 के विधानसभा चुनावों में, कुल 3.56 करोड़ वोटों में से लगभग 76 लाख वोट (21.34%) ऐसे थे जो न तो सत्तारूढ़ कांग्रेस को पड़े थे और न ही बीजेपी को, ऐसे में नई गठबंधन का मानना है कि इस चुनाव में वे मुख्य रूप से इसी संख्या को टारगेट कर रहे हैं.

पिछले विधानसभा चुनाव में किसे कितने वोट

साल 2018 में हुए विधानसभा चुनाव की बात करें तो कुल डाले गए 3.56 करोड़ वोटों में से कांग्रेस और उसके सहयोगियों लोकतांत्रिक जनता दल, राष्ट्रीय लोक दल और एनसीपी ने 1.40 करोड़ से ज्यादा वोट हासिल किए थे. वहीं भारतीय जनता पार्टी को 1.38 करोड़ मिले थे. इसके अलावा 58 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली आरएलपी को कुल 8.5 लाख वोट मिले थे.

मजबूत नेताओं को अपना प्रत्याशी बना रहा है ये गठबंधन

राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी और आजाद समाज पार्टी ने गठबंधन का ऐलान करने के साथ ही मजबूत नेताओं को अपना प्रत्याशी बनाना शुरू कर दिया है. ये नेता ऐसे प्रत्याशियों को पार्टी में ला रहे हैं जिन्होंने साल 2018 के विधानसभा चुनाव में काफी मजबूती के साथ चुनाव लड़ा था और दूसरे नंबर पर रहे थे.

आजाद समाज पार्टी ने बानसूर से भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता रोहिताश शर्मा को अपना प्रत्याशी बनाया है. रोहिताश शर्मा बीजेपी के कद्दावर नेता माने जाते हैं प्रदेश में बीजेपी सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष डॉ सतीश पूनियां के खिलाफ बयानबाजी करने के कारण उन्हें भारतीय जनता पार्टी से निष्काषित किया गया था. इसलिए वो अब आजाद समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं.

इसके अलावा आजाद समाज पार्टी ने नेम सिंह फौजदार को अपना प्रत्याशी बनाया है. नगर विधानसभा से नेम सिंह मजबूत उम्मीदवार माने जा रहे हैं.  इस बार दलित वोट आने की उम्मीद के कारण नेम सिंह राजस्थान विधानसभा सीट पर सबसे मजबूत प्रत्याशी माने जा रहे हैं.

नगर विधानसभा सीट पर 50 हजार मुस्लिम मतदाता, 45 हजार गुर्जर मतदाता और 40 हजार जाट मतदाता हैं. यहां 36 हजार अनुसूचित जाति के मतदाता हैं. अब राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी और आजाद समाज पार्टी के गठबंधन से जाट और दलित एक हो जाते हैं तो आजाद समाज पार्टी का प्रत्याशी नेम सिंह मजबूती के साथ बीजेपी और कांग्रेस का गणित बिगाड़ सकता है.

क्या रहा है जाट वोटर्स का इतिहास?

राजस्थान में सत्ता में पहली बार आई कांग्रेस सरकार ने टीकाराम पालीवाल के नेतृत्व में साल 1950 में जागीरदारी व्यवस्था को समाप्त कर दिया था और किसानों को जमीन पर अधिकार देते हुए कई सुधार पेश किए थे.

ऐसा करना प्रदेश के कृषक समुदाय के लिए बहुत बड़ी जीत साबित हुई. जिसके बाद नाथू राम मिर्धा, कुम्भा राम आर्य और राम निवास मिर्धा जैसे कई पार्टी नेता विधायक, फिर मंत्री और यहां तक कि केंद्रीय मंत्री भी बने. उनके परिवार अभी भी राजनीति में हैं.

साल 1977 में हिंदी पट्टी में एकाध सीट ही ऐसी थी, जिस पर कांग्रेस के सांसद चुनाव जीते थे. जिनमें नागौर सीट भी शामिल थी, इस सीट पर नाथूराम मिर्धा चुनाव जीते थे.

हालांकि साल 1998 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस में गहलोत के प्रभुत्व के बाद परसराम मदेरणा जैसे वरिष्ठ जाट नेताओं को कथित तौर पर दरकिनार किया गया. पार्टी के इस कदम ने जाट समुदाय के भीतर कांग्रेस के प्रति नाराजगी बढ़ा दी.

साल 2003 में विधानसभा चुनाव के प्रचार प्रसार के दौरान सीकर में आयोजित एक रैली में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने  घोषणा की कि वह जाटों को ओबीसी श्रेणी में शामिल करेंगे और प्रदेश का जाट समुदाय आरक्षण के लिए पात्र होंगे. इस चुनाव में जाट समुदाय का झुकाव बीजेपी की तरफ नजर आया.

इसी साल जब वसुंधरा राजे को बीजेपी की तरफ से सीएम चेहरा बनाया गया तो उन्होंने खुद को जाटों की बहू बताया और समुदाय से वोट देने की अपील की, जिसके बाद से जाट वोटों को कांग्रेस और बीजेपी के बीच समान रूप से विभाजित देखा जाता है, क्योंकि दोनों ही पार्टियों में जाट समुदाय से आने वाले कई विधायक हैं.

अब साल 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने जाट समुदायों को लुभाने के लिए एक कदम आगे बढ़ाते हुए नाथूराम मिर्धा की पोती नागौर से पूर्व सांसद ज्योति मिर्धा को पार्टी में शामिल कर लिया है. बीजेपी ज्योति से ज्यादा से ज्यादा जाट वोटर्स को लुभाने की उम्मीद कर रही है.

राजस्थान में छोटी पार्टियों का क्या है हाल

साल 2018 में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम को देखें तो इस चुनाव में कांग्रेस और बीजेपी के बीच सिर्फ आधा फीसद वोटों के अंतर ने बड़ा उलट फेर कर दिया था. कांग्रेस को लगभग 39.30 प्रतिशच वोट तो बीजेपी को 38.77 प्रतिशत वोट मिले थे. पर आधा फीसद वोटों के मामूली अंतर की वजह से 27 सीटों का फासला दोनों दलों के बीच हो गया.

जिसका मतलब है कि उस चुनाव में कांग्रेस को बीजेपी से 27 सीटें ज्यादा जीती थी. ठीक इसी तरह छोटे दलों को कुल मिलने वोटों के आंकड़ों करीब 12 प्रतिशत था. इससे ये तो साफ है कि पिछली बार के चुनावों में छोटी पार्टियों ने भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के वोटों में बड़ी हिस्सेदारी कर ली.

साल 2018 के चुनावों में लगभग 86 दलों ने हिस्सा लिया था. इस बार भी इस आंकड़े का इसी के आसपास होने की उम्मीद है. साल 2018 के चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों को 9.47 फीसदी मत मिले थे और उन्होंने 13 सीटें जीती थी. कुल मिलाकर छोटे दलों और निर्दलीयों को मिले वोट मिलाकर लगभग 22 फीसद वोट होता है, जो दोनों पार्टियां मिस कर गईं.

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