Wednesday, March 11, 2026
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वैद्यों की परम्परागत चिकित्सा विधाओं के संरक्षण, संवर्धन एवं दस्तावेजीकरण की आवश्यकता : मंत्री श्री परमार

उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं आयुष मंत्री श्री इन्दर सिंह परमार ने कहा कि भारत की प्राचीन परम्परागत चिकित्सा विधाएं, हमारी सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विरासत का महत्वपूर्ण अंग हैं। आयुर्वेद, लोक-चिकित्सा और पारंपरिक वैद्यक पद्धतियों ने सदियों से समाज को स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान की है। श्री परमार ने कहा कि वर्तमान समय में इन पद्धतियों के संरक्षण, संवर्धन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुरूप दस्तावेजीकरण की आवश्यकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इन ज्ञान परंपराओं का लाभ प्राप्त कर सकें।

आयुष मंत्री श्री परमार रविवार को सतना जिले के चित्रकूट स्थित, उद्यमिता विद्यापीठ चित्रकूट के लोहिया सभागार में आयोजित परंपरागत वैद्य सम्मेलन के समापन कार्यक्रम में सहभागिता कर संबोधित कर रहे थे।

आयुष मंत्री श्री परमार ने कहा कि राज्य सरकार, आयुष पद्धतियों के विकास के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। प्रदेश में आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा और पारंपरिक उपचार प्रणालियों को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ इनके प्रशिक्षण और अनुसंधान को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। श्री परमार ने कहा कि प्रकृति के तीन महत्वपूर्ण अवयव वनस्पति, जल और सूर्य की ऊर्जा औषधि के रूप में प्राप्त होते है। श्री परमार ने कहा कि आयुर्वेद में अनेक असाध्य रोगों का उपचार और समाधान निहित है। मण्डला जिले में 18 तरह की जड़ी-बूटियां वहां उपचार के काम आ रही है। जिनका उल्लेख आयुर्वेद के किताब में भी नहीं है।

मंत्री श्री परमार ने कहा कि प्रदेश में वर्ष 2023 तक मात्र 7 आयुर्वेद कालेज हुआ करते थे। वर्ष 2024-25 में 8 नये आयुर्वेद के कॉलेज बनाये जा रहे है। मंत्री श्री परमार ने कहा कि यूनानी चिकित्सा के छात्रों को अब हिन्दी भाषा में पढाया जायेगा। उन्होंने कहा कि परंपरागत वैद्यों के अनुभव और ज्ञान को संस्थागत रूप से संरक्षित करना समय की आवश्यकता है, जिससे ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में लोगों को सुलभ और किफायती स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें। श्री परमार ने कहा कि चित्रकूट जैसी तपोभूमि और ज्ञानभूमि में इस प्रकार के आयोजनों का विशेष महत्व है। यहां आयोजित सम्मेलन से पारंपरिक वैद्यक पद्धतियों को नई दिशा मिलेगी और आयुष चिकित्सा के क्षेत्र में कार्य कर रहे विशेषज्ञों को अपने अनुभव साझा करने का अवसर मिलेगा।

कार्यक्रम में उपस्थित विशेषज्ञों ने भी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के संरक्षण, जड़ी-बूटी आधारित उपचार, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में वैद्यों की भूमिका तथा आयुष पद्धतियों के वैज्ञानिक अध्ययन जैसे विषयों पर अपने विचार रखे।

कार्यक्रम को संत माधवदास महाराज, कुलगुरू महात्मा गांधी चित्रकूट विष्वविद्यालय श्री आलोक चौबे, वैद्य रामषिरोमणि त्रिपाठी, वैद्य सोहनलाल ने भी संबोधित किया। सम्मेलन के दौरान विभिन्न सत्रों में पारंपरिक औषधीय ज्ञान, वनौषधियों के उपयोग और जनस्वास्थ्य में आयुष की भूमिका पर विस्तृत चर्चा की गई। समापन अवसर पर अतिथियों द्वारा परंपरागत वैद्यों को सम्मानित भी किया गया और उनके अनुभवों को समाज के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए इस ज्ञान को संरक्षित रखने का आह्वान किया गया। कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए परंपरागत वैद्य, आयुष विशेषज्ञ, शोधकर्ता तथा सामाजिक कार्यकर्ता बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

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