भारत प्राचीन काल से ही इस दुनिया में विज्ञान और तकनीक से जुड़े ज्ञान का केंद्र माना जाता रहा
है। बीच में एक दौर ऐसा भी आया जब विदेशी शासकों और औपनिवेशिक युग ने कई प्रमुख संस्थानों
को इतना नुकसान पहुंचाया कि उन्हें आज तक फिर जिंदा नहीं किया जा सका। लेकिन ‘देश, काल,
परिस्थिति’ के महत्व का यह वर्णन प्राचीन पवित्र ग्रंथों में रहा है और बीते 10 वर्षों में हम धर्म के
प्रति समग्र दृष्टिकोण में बड़े और स्पष्ट बदलाव होते देख रहे हैं। भू-राजनीति से लेकर हमारी विदेश
नीति तक, ‘भारतीय बोध’ के एकीकरण और ‘हम’ पर जोर ने भारत को देखने वाले दुनिया के नजरिये
पर जबरदस्त प्रभाव डाला है। भारत के संविधान की मूल प्रति में भी मौलिक अधिकारों के खंड परभगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी का विजय के बाद अयोध्या लौटने का जो चित्र बना हुआहै, वह इस बात का प्रमाण है कि मौलिक अधिकारों के प्रेरणा स्रोत भगवान श्रीराम हैं। भगवान श्रीराममंदिर के पुनर्निर्माण का प्रयास 500 वर्षों से चल रहा था। प्रधानमंत्री मोदी के मार्गदर्शन में राम मंदिरनिर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर निर्माण के साथ काशी की छवि बदल गई है।
बनारस आज एक नई काशी के रूप में दिखने लगा है। काशी-तमिल संगमम उत्सव की तरह मनाया
गया। दुनिया भर से लोग भारत और उसकी आध्यात्मिक राजधानी काशी की सांस्कृतिक गहराई में
डूब कर खुद को भाग्यशाली मानते हैं। इससे बनारस और आसपास के क्षेत्र की आर्थिक प्रगति को भी
नए पंख मिल गए हैं। सोमनाथ मंदिर, उज्जैन में महाकाल लोक, गुवाहटी में कामाख्या मंदिर, ओडिशा
में जगन्नाथ मंदिर, चारधाम का कायाकल्प, भारत को सांस्कृतिक-आध्यात्मिक रूप से विश्व पटल पर
ले जाने में इससे सफलता मिली है। साथ ही, गुजरात के मेहसाणा में चालुक्य काल में बनाए गए सूर्य
मंदिर का पुनरुद्धार हुआ है। पुणे में तुकाराम महाराज मंदिर, गुजरात में कालिका माता मंदिर जैसे
अनेक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्रों के पुनरुद्धार पर सरकार ने काम किया है। आस्था के ये
केंद्र सिर्फ एक ढांचा नहीं बल्कि भारत के लिए प्राणशक्ति है, प्राणवायु की तरह हैं। यह हमारे लिए
ऐसे शक्तिपुंज हैं जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी हमें जीवंत बनाए रखते हैं। इसी सोच से
बीते कुछ वर्षों में एक दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ पुनरोद्धार की पहल हुई है।
देश के विभाजन के समय करतारपुर साहिब सीमा के उस पार रह गए थे, वहीं आज पवित्र गुरुद्वारा
करतारपुर साहिब का द्वार खुला है जिससे करोड़ों सिखों की आस्था को पूरा किया गया है। अपने
धर्म की रक्षा करने के लिए सिखों के 10वें गुरू श्री गुरु गोविंद सिंह के बेटों ने खुद को दीवार में
चुनवाना स्वीकार किया था, उन वीर बालकों को स्थायी रूप से सम्मान देते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने 26
दिसंबर को वीर बाल दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की। हाल ही में बनी संसद की नई इमारत
के निर्माण और इसकी शुरुआत ने भी भारत के स्वर्ण युग की यादें ताजा कर दी हैं। प्रधानमंत्री मोदी
ने 28 मई को जब नई संसद में चोल राजवंश से जुड़े ‘सेन्गोल’ (राजदंड) की स्थापना की तो यह देश
के लिए जड़ों से जोड़ने वाला संजोया गया क्षण रहा।
सांस्कृतिक पुनरुद्धार के दौर में देश सभी धर्म के आस्था केंद्रों के पुनरुद्धार पर काम कर रहा है।
हिमालयी संस्कृति और बौद्ध संस्कृति का संरक्षण किया जा रहा है। विदेशों में भी भारतीय मंदिरों के
पुनरुद्धार और नए मंदिरों का निर्माण भारत की संस्कृति के एक प्रतीक के रूप में उभरा है। गंगा
नदी के पुनरुद्धार के लिए मिशन मोड में नमामि गंगे अभियान चलाया गया। गंगा केवल धार्मिक ही
नहीं, सांस्कृतिक रूप से भी महत्व रखती है। गंगा किनारे विकसित हुए सांस्कृतिक केंद्रों को विश्व
पटल पर लाने, ज्ञान गंगा और अर्थ गंगा के रूप में गंगा को स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण कदम
उठाए गए हैं। संस्कृति और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव के कारण बीते 10 वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी ने
स्वयं अनेक बार सीमावर्ती क्षेत्रों, केदारनाथ धाम, बद्रीनाथ धाम एवं अन्य संप्रदायों के धार्मिक स्थलों
की यात्रा की और भारत की विविध संस्कृतियों के पुनरुद्धार की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति के लिए
कदम उठाए। 2014 से अब तक भारत की कई सांस्कृतिक धरोहरों को यूनेस्को से मान्यता मिली है।
यह प्रमाणन भारत की संस्कृति को विश्व भर में पहचान, भारतीय सांस्कृतिक विरासतों के पुनरुद्धार की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है। आज भारत नए आर्थिक-सामरिक शक्ति केंद्र के साथ-साथ
सांस्कृतिक विरासत को सहेजते हुए ज्ञान-विज्ञान और संस्कृति के केंद्र के रूप में पूरे विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर रहा है।




